मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013
शुक्रवार, 16 अगस्त 2013
सोमवार, 12 अगस्त 2013
सोया क्यों नहीं अब तक ......
एक दिन बाजार गया.......
थका आया ....... नींद लगी ........
आंखे मंद हुई............
सोया नहीं!
दीवारों से चीख निकली.......
सन्नाटों की आवाज आई......
झूठे बर्तनों.... पे नरम मासूम हाथों की रगड़ ,
आँखों मे झलकती बचपन बेअसर........
जूते चमकाते हाथ थकते नहीं......
दारू की भट्टी पे चेहरे झुलसते नहीं.......
कोमल कंधे अब हर बोझ सह लेते हैं.....
. क्योंकि
भूखे पेट उम्मीद नहीं सह सकते हैं.........
इस समाज के जन्मे हम........
सिर्फ चार शब्दों मे .... कर्तव्य ढूंढ लेते हैं॥
हर कविता पढ़-लिख कर ,
समाज बदलना चाहते हैं...
क्यों आ जाती है नींद,
मानव बन कर ॥
फिर भी
सोया नहीं अब तक ........
मंगलवार, 2 जुलाई 2013
जागो सवेरा हो गया॥ wake up seeds.......: अहले सुबह .... मुझसे न टकराओ ........
जागो सवेरा हो गया॥ wake up seeds.......: अहले सुबह .... मुझसे न टकराओ ........: अब लगता है ... खुद को बदल नहीं पाऊँगा !! मेरे खयाल से कोई भी खुद को बदल नहीं सकता ... हाँ खुद को सँवारने की क्षमता हर किसी के पास होती है...
अहले सुबह .... मुझसे न टकराओ ........
अब लगता है ... खुद को बदल नहीं पाऊँगा !! मेरे खयाल से कोई भी खुद को बदल नहीं सकता ... हाँ खुद को सँवारने की क्षमता हर किसी के पास होती है, बस समझने भर का फेर है।
आज जैसे युवा वाले अच्छे गुण मेरे पास हैं ही नहीं.... की खुद के डोले सोले बनाऊ॥ लेकिन फिट -फाट रहना चाहता हूँ... जिसके लिए बस सोचता ही रहता हूँ,,,, कर्म की स्थिति तो डामाडोल है। प्रयासरत हूँ ..... जैसे हमारी सरकार..... आर्थिक गतिविधियों पे नजर डाले सोच रही है। बहुतेरे ऐसे मेरे जैसे हमारे देश में हैं.... और आने वाले समय में बहुमत में रहेंगे .... जिस तरह से खुद को संयमित नहीं कर पाते भला देश के प्रति क्या खाक करेंगे ....
एक बात है खुद को कोसने में बड़ा मजा आता है मुझे..... और कभी-कभी मेरे लिए लाभदायक भी सिद्ध होता है.... काश आज देश की सत्ता में रहने वाले भी कोसते !! तो देश को भी विकास की राह मिल ही जाती। आज जिस फेर बदल की शिकार हमारी लोकतन्त्र राजनीति हो गई है, उसे देख के लगता है कि कोई माँ - बाप सरगेसी पे निर्भर हो गया है... संतान कि चाह तो रखता है पर ज़िम्मेदारी से भागता है....... हे राजनीति के ईश्वर .... इस देश को सत्ता सरगेसी से बचाना ....... नहीं तो पूरा देश नेतृत्व के बांझ से ग्रसित होगा........
आज जैसे युवा वाले अच्छे गुण मेरे पास हैं ही नहीं.... की खुद के डोले सोले बनाऊ॥ लेकिन फिट -फाट रहना चाहता हूँ... जिसके लिए बस सोचता ही रहता हूँ,,,, कर्म की स्थिति तो डामाडोल है। प्रयासरत हूँ ..... जैसे हमारी सरकार..... आर्थिक गतिविधियों पे नजर डाले सोच रही है। बहुतेरे ऐसे मेरे जैसे हमारे देश में हैं.... और आने वाले समय में बहुमत में रहेंगे .... जिस तरह से खुद को संयमित नहीं कर पाते भला देश के प्रति क्या खाक करेंगे ....
एक बात है खुद को कोसने में बड़ा मजा आता है मुझे..... और कभी-कभी मेरे लिए लाभदायक भी सिद्ध होता है.... काश आज देश की सत्ता में रहने वाले भी कोसते !! तो देश को भी विकास की राह मिल ही जाती। आज जिस फेर बदल की शिकार हमारी लोकतन्त्र राजनीति हो गई है, उसे देख के लगता है कि कोई माँ - बाप सरगेसी पे निर्भर हो गया है... संतान कि चाह तो रखता है पर ज़िम्मेदारी से भागता है....... हे राजनीति के ईश्वर .... इस देश को सत्ता सरगेसी से बचाना ....... नहीं तो पूरा देश नेतृत्व के बांझ से ग्रसित होगा........
रविवार, 14 अप्रैल 2013
ज़िंदगी के मकसद को ढूँढती ये बेफ़जुल पंक्ति .......
खुद से तो खुदा भी परेशान
जरूरत न हो तो ....ज़िंदगी भी आसान ....
फर्क की वजह यू ही ढूंढते हैं.....
भ्रम में खुद को यू ही सोचते हैं....
है जज्बा तो इस रफ़्तार को पहचान ....
जरूरत न हो तो ....ज़िंदगी भी आसान ....
खुद से तो खुदा भी परेशान .....
वक़्त कि बेड़ियाँ किसे कब बांधती है !
हो बुलंद आवाज तो खुदा भी मानती है...
न कर इस सच्चे दिल को बेईमान .....
जरूरत न हो तो ....ज़िंदगी भी आसान ....
खुद से तो खुदा भी परेशान .....
गुरुवार, 11 अप्रैल 2013
कुछ कुरेदो ज़िंदगी को ,,,,मायने खुद व खुद निकाल जाएंगे......
वही सभी.है....शाम का......
कुछ नाम का....कुछ काम का ....
अलमस्त शहर उन यादों में ....
कुछ शरारत भरी बातों में ....
निज का झूठा वादा ही सही....
अपनेपन को दिलासा ही सही.....
दो वक़्त ...मजा है उस खयाल का....
कुछ नाम का....कुछ काम का ...
है कुछ और भी....
रुको, करो गौर भी.....
ये सारी पंक्ति पता नहीं कैसी है.... लेकिन जो भी है.... कुछ तेरी है कुछ मेरी है..... अनीष "स्वर"
मंगलवार, 9 अप्रैल 2013
वक़्त के साथ.....और वक़्त के लिए...... दोस्तों कुछ मेरी आपकी पंक्ति.....
अब ज़िंदगी का बौराना .... मजे में खुद को लुटाना .....
एक पल के डगर पे..... घंटो वक़्त बिताना .......
अच्छा नहीं लगता.... सच्चा नहीं जँचता ........
अब झूठे वादे के साये मे ...
सपनों के दुनिया में .....
हँसते हुए चेहरे का....
मित्रों के ठहाकों का....
इस लम्हों का नजराना ..... खुद मंजिल से फिसल जाना.....
एक पल के डगर पे..... घंटो वक़्त बिताना .......
अच्छा नहीं लगता.... सच्चा नहीं जँचता ........
क्यों खुद को तोड़ने में .....
मुश्किलों को मरोड़ ने में ......
अपने बाजू के ताकत का...
बढ़ते हुए आत्मविश्वास का ....
समय का साथ दे जाना .... फिर रास्तों का मिल जाना ...
एक पल के डगर पे..... घंटो वक़्त बिताना .......
अच्छा वही लगता..... सच्चा वही जँचता.......
अनीष 'स्वर'
फिर आ गई उनकी याद..... वो नहीं आए .....
अब चंद लम्हे अब याद नहीं आते.....
किसे भूल जाऊ... वो ख्याल नहीं आते.....
वक़्त के साथ सब कुछ सँवरता है.....
दिन के उजाले के बाद शाम भी ढलता है......
उन सितारे की गिनती अब भूल नहीं पाते.....
कोशिश के बाद भी ये अश्क सुख नहीं पाते ...
अब चंद लम्हे अब याद नहीं आते.....
किसे भूल जाऊ... वो ख्याल नहीं आते....
यूं तो ज़िंदगी एक मकसद को जीती है......
कभी फीकी ही सही फिर भी कभी रसीली है.....
पर उन दरारों मे अब पैबस्त हो नहीं पाते .....
मिट्टी मे सने यादों को धो नहीं पाते ......
अब चंद लम्हे अब याद नहीं आते.....
किसे भूल जाऊ... वो ख्याल नहीं आते...
.. अनीष 'स्वर'
सोमवार, 1 अप्रैल 2013
दूसरे में खुद को देख, दीवाना हो जाएगा.....
कहीं खुशियों से ऊबे तो नहीं ..... अक्सर होता है की क्षणिक स्वार्थ में ऐसे अमूल्य रिश्तों को ठुकरा कर कर हम अपनी खुशियों को तलाशने लगते हैं, और बाद में हर चीज गवा बैठते हैं। खुद के लिए खुशियाँ झूठी हो जाती है, इस लिए हो सके तो असली खुशियों को तलाशिये अपनो में।
मुश्किल कार्य नहीं है पर समय लेता है।
कठिन है लेकिन ज़िंदगी आसान बना देता है ।
हो सके तो मैं-तुम की दुनिया से एक नजर बाहर भी देख ली जाय ।
मुश्किल कार्य नहीं है पर समय लेता है।
कठिन है लेकिन ज़िंदगी आसान बना देता है ।
हो सके तो मैं-तुम की दुनिया से एक नजर बाहर भी देख ली जाय ।
इस दो पंक्ति में ......
एक रोज सब गीत गाएँगे ,
फिर हो सके तो गुनगुना पाएंगे,
उसके बाद गीत शायद उन्हें याद रहे,
वरना इस मैं-तुम की दुनिया में सारे भूल जाएंगे,,,,,
ये ईश्वर, खुदा, मसीहा,
सब बातों की फितरत में आते हैं।
'मैं' आने पर ना जाने कहाँ चले जाते हैं।
ना खुद पे यकीन आए तो ,
मौजूद रह कर भी खामोशी बयां कर जाते हैं।
हर सवाल का जवाब हमेशा ही खोजा करते हैं।
तभी सारे उलझन से परे ,
फिर एक गीत हम लिख जाते हैं।
धुन अपने मे ही बनाकर .....
फिर हो सके तो गुनगुना पाएंगे
एक रोज सब गीत गाएँगे
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