बहुत दिनों की इच्छा, प्रयत्न एवं एक संकल्प ले ब्लॉग का साथ निभाने चले आया हूँ।
वो दिन आ गया, और मैं साथ हूँ इसके, इस कोरे कागज की कशमशाहट से परिचय हो गई है मेरी। परंतु एक और बातें हैं जिसके बिना ब्लॉग, मैं और मेरी कीबोर्ड, अपने में तालमेल नहीं बैठा पाएगी, वो है मेरे अंदर की कुलबुलाहट ! ये रहेगी तो शब्द समय और शरीर हमेशा मेरा साथ देता रहेगा। कुछ समय अंदर की बेचैनी को रोक तो सकता हूँ परंतु ऐसा नहीं की खत्म कर सो सकता हूँ। ये कुलबुलाहट, बेचैनी, द्वंद का एक ही कारण है जीवन और जीवन से असंतुष्टि ! जीवन का हर पड़ाव किसी न किसी लक्ष्य को आपके सामने प्रस्तुत करता है, और यही लक्ष्य आप के वर्तमान स्थिति से आपको अवगत करता है । और जब सारी सच्चाई से आप रुबरु होते हैं तो आप खूबी और खामियों का तराजू लिए सोचते जाते हैं, सर खुजलाते जाते हैं। ये हर व्यक्ति में ऐसे केमिकल लोचे होते हैं और इसको संतुलित करने का सबका अपना -अपना फंडा, तरीका होता है। कोई दिमाग द्वारा हल खोजता, तो कोई दिल पर हाथ रख सोचता, कोई तो बस यूं टर्न अबाउट !!!
ये टर्न अबाउट ही आगे चलकर अस्तित्ववाद का खतरा पैदा करती है। जो ये खतरा सह कर फिर से उस रेस में शामिल हो जाता है वो तो बादशाह, पर जो संभल नहीं पता वो कड़वी सच्चाई के दंश को पूरी ज़िंदगी झेलता है, जो भारत के अधिकांश युवा में देखा जा सकता है। इस बातों का मेरे पास सबूत तो नहीं परंतु अपने पिछले आठ वर्षों के अनुभव का पिटारा तो है। काश ये पिटारा आगे आने वाले अनुभव को शामिल न करे।
लेकिन .......आँखें हमारी बंद नहीं , ये तो मौका तलाश रही है.....
................किसी मंजिल चाह में, ... अभी खुद को टाल रही है ..........
वो दिन आ गया, और मैं साथ हूँ इसके, इस कोरे कागज की कशमशाहट से परिचय हो गई है मेरी। परंतु एक और बातें हैं जिसके बिना ब्लॉग, मैं और मेरी कीबोर्ड, अपने में तालमेल नहीं बैठा पाएगी, वो है मेरे अंदर की कुलबुलाहट ! ये रहेगी तो शब्द समय और शरीर हमेशा मेरा साथ देता रहेगा। कुछ समय अंदर की बेचैनी को रोक तो सकता हूँ परंतु ऐसा नहीं की खत्म कर सो सकता हूँ। ये कुलबुलाहट, बेचैनी, द्वंद का एक ही कारण है जीवन और जीवन से असंतुष्टि ! जीवन का हर पड़ाव किसी न किसी लक्ष्य को आपके सामने प्रस्तुत करता है, और यही लक्ष्य आप के वर्तमान स्थिति से आपको अवगत करता है । और जब सारी सच्चाई से आप रुबरु होते हैं तो आप खूबी और खामियों का तराजू लिए सोचते जाते हैं, सर खुजलाते जाते हैं। ये हर व्यक्ति में ऐसे केमिकल लोचे होते हैं और इसको संतुलित करने का सबका अपना -अपना फंडा, तरीका होता है। कोई दिमाग द्वारा हल खोजता, तो कोई दिल पर हाथ रख सोचता, कोई तो बस यूं टर्न अबाउट !!!
ये टर्न अबाउट ही आगे चलकर अस्तित्ववाद का खतरा पैदा करती है। जो ये खतरा सह कर फिर से उस रेस में शामिल हो जाता है वो तो बादशाह, पर जो संभल नहीं पता वो कड़वी सच्चाई के दंश को पूरी ज़िंदगी झेलता है, जो भारत के अधिकांश युवा में देखा जा सकता है। इस बातों का मेरे पास सबूत तो नहीं परंतु अपने पिछले आठ वर्षों के अनुभव का पिटारा तो है। काश ये पिटारा आगे आने वाले अनुभव को शामिल न करे।
लेकिन .......आँखें हमारी बंद नहीं , ये तो मौका तलाश रही है.....
................किसी मंजिल चाह में, ... अभी खुद को टाल रही है ..........