शुभ प्रभात ..... दोस्तों
आप सभी को इस तिथि ... इस समय से संबंधित सारे त्योहारों की बधाई हो......
मैं जहां से हूँ ...... वहाँ की ठेठ .... दही - चूड़ा एवं तिलकुट की ढेर सारी शुभकमनाएं ।
एक विशेष बातों से आपको अवगत करता हूँ ........
आज के दिन माँ अपने बेटों से , और घर के अन्य बड़े सदस्य अपने छोटे सदस्य से वचन लेते हैं....
कैसे..... बड़े अपने हाथ में गुड़ और तिल ले कर छोटे के हाथ में प्रसाद रूप मे तीन या पाँच बार देते हैं और साथ बोलते हैं " तिले तिले बह देब न !और छोटा हाँ हाँ कह कर प्रसाद ग्रहण करता है ....
इस " तिले तिले बह देब न ! का अर्थ है तिल तिल का साथ ... यानि ज़िंदगी के हर कदम पर साथ ... तेरी मदद जिससे जीने की आश बंधी रहे .........
ये माँ अपने बेटे को हर साल याद दिलाती है........ ऐसा क्यों.... आपके प्रश्न हो सकते हैं.....
लेकिन यह परंपरा वह अपने लिए नहीं बच्चों के लिए निभाती है॥ उसे अपने कर्तव्य के तरफ अग्रसर होने के लिए प्रेरित करती है........ की जीवन के हर पल मदद की भावना बनी रहे आपने के लिए भी , समाज के लिए भी और देश के लिए भी...............
आज कितने माँ बाप अपने संतान से ही पीड़ित हैं...... बूढ़े होने पर घर से निकाल दिया जाते हैं ... भारतीय संकृति मे कितनी बुरी बात है .....
आज का दिन शपथ का हो की किसी कीमत पर अपने माँ बाप का जीते जी साथ न छोड़े और जहां तक हो सके उन भटकते वृद्धों की मदद के लिए आगे आयें ।