रविवार, 14 अप्रैल 2013

ज़िंदगी के मकसद को ढूँढती ये बेफ़जुल पंक्ति .......


खुद से तो खुदा भी परेशान


 जरूरत न हो तो ....ज़िंदगी भी आसान ....



फर्क की वजह यू ही ढूंढते हैं.....




भ्रम में खुद को यू ही सोचते हैं....




है जज्बा तो इस रफ़्तार को पहचान ....



जरूरत न हो तो ....ज़िंदगी भी आसान ....


खुद से तो खुदा भी परेशान ..... 



वक़्त कि बेड़ियाँ किसे कब बांधती है   !

हो बुलंद आवाज तो खुदा भी मानती है...


न कर इस सच्चे दिल को बेईमान .....



जरूरत न हो तो ....ज़िंदगी भी आसान ....



खुद से तो खुदा भी परेशान ..... 


गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

कुछ कुरेदो ज़िंदगी को ,,,,मायने खुद व खुद निकाल जाएंगे......


है कुछ और भी...

रुको, करो गौर भी.....

                 वही सभी.है....शाम का......

कुछ नाम का....कुछ काम का ....

            
             अलमस्त शहर उन यादों में ....
             कुछ शरारत भरी बातों में ....
            निज का झूठा वादा ही सही....
               अपनेपन को दिलासा ही सही.....
         
            दो वक़्त ...मजा है उस खयाल का....
              कुछ नाम का....कुछ काम का ...
         है कुछ और भी....
           रुको, करो गौर भी.....

ये सारी पंक्ति पता नहीं कैसी है.... लेकिन जो भी है.... कुछ तेरी है कुछ मेरी है..... अनीष  "स्वर"

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

वक़्त के साथ.....और वक़्त के लिए...... दोस्तों कुछ मेरी आपकी पंक्ति.....


अब ज़िंदगी का बौराना ....  मजे में खुद को लुटाना .....

एक पल के डगर पे..... घंटो वक़्त बिताना .......

अच्छा नहीं लगता.... सच्चा नहीं जँचता ........


अब झूठे वादे के साये मे ...
सपनों के दुनिया में .....
हँसते हुए चेहरे का....
मित्रों के ठहाकों का....


इस लम्हों का नजराना ..... खुद मंजिल से फिसल जाना.....
एक पल के डगर पे..... घंटो वक़्त बिताना .......
अच्छा नहीं लगता.... सच्चा नहीं जँचता ........


क्यों खुद को तोड़ने में .....
मुश्किलों को मरोड़ ने में ......
अपने बाजू के ताकत का...
बढ़ते हुए आत्मविश्वास का ....


समय का साथ दे जाना .... फिर रास्तों का मिल जाना ...
एक पल के डगर पे..... घंटो वक़्त बिताना .......
अच्छा वही लगता..... सच्चा वही जँचता.......

अनीष 'स्वर'


फिर आ गई उनकी याद..... वो नहीं आए .....


अब चंद लम्हे अब याद नहीं आते.....

किसे भूल जाऊ... वो ख्याल नहीं आते.....

वक़्त के साथ सब कुछ सँवरता है.....
दिन के उजाले के बाद शाम भी ढलता है......
उन सितारे की गिनती अब भूल नहीं पाते.....
कोशिश के बाद भी ये अश्क सुख नहीं पाते ...
                       अब चंद लम्हे अब याद नहीं आते.....
                         किसे भूल जाऊ... वो ख्याल नहीं आते....

यूं तो ज़िंदगी एक मकसद को जीती है......
कभी फीकी ही सही फिर भी कभी रसीली है..... 
पर उन दरारों मे अब पैबस्त हो नहीं पाते .....
मिट्टी मे सने यादों को धो नहीं पाते ......
                  अब चंद लम्हे अब याद नहीं आते.....
                       किसे भूल जाऊ... वो ख्याल नहीं आते...

                                                                             .. अनीष 'स्वर'

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

दूसरे में खुद को देख, दीवाना हो जाएगा.....

कहीं खुशियों से ऊबे तो नहीं ..... अक्सर होता है की क्षणिक स्वार्थ में ऐसे अमूल्य रिश्तों को ठुकरा कर कर हम अपनी खुशियों को तलाशने लगते हैं, और बाद में हर चीज गवा बैठते हैं। खुद के लिए खुशियाँ झूठी हो जाती है, इस लिए हो सके तो असली खुशियों को तलाशिये  अपनो में।
 मुश्किल कार्य नहीं है पर समय लेता है। 
कठिन है लेकिन ज़िंदगी आसान बना देता है ।
 हो सके तो मैं-तुम की दुनिया से एक नजर बाहर भी देख ली जाय । 

इस दो पंक्ति में ......

एक रोज सब गीत गाएँगे ,
फिर हो सके तो गुनगुना पाएंगे, 
उसके बाद गीत शायद उन्हें याद रहे, 
वरना इस मैं-तुम की दुनिया में सारे भूल जाएंगे,,,,,

ये ईश्वर, खुदा, मसीहा, 
सब बातों की फितरत में आते हैं। 
'मैं' आने पर ना जाने कहाँ चले जाते हैं। 
ना खुद पे यकीन आए तो ,
मौजूद रह कर भी खामोशी बयां कर जाते हैं। 
हर सवाल का जवाब हमेशा ही खोजा करते हैं। 

तभी सारे उलझन से परे , 
फिर एक गीत हम लिख जाते हैं। 
धुन अपने मे ही बनाकर ..... 
फिर हो सके तो गुनगुना पाएंगे
एक रोज सब गीत गाएँगे

आज भगत जिंदा है.......

ए भगत तेरी सहादत ..... मरते दम तक याद रहेगी ... य

हर रोज की भांति आज जिंदा हूँ.....कल भी था ..... आज भी हूँ....चेहरे बदले . हैं आज भी स्वत्रंत परिंदा हूँ.....बस फर्क है .... महसूस करने में ...दिल की बातें ... जुबान पे लाने में .....मिट्टी के कण-कण में .....आज भी सना हूँ.....हर रोज की भांति आज जिंदा हूँ.....