सोमवार, 1 अप्रैल 2013

दूसरे में खुद को देख, दीवाना हो जाएगा.....

कहीं खुशियों से ऊबे तो नहीं ..... अक्सर होता है की क्षणिक स्वार्थ में ऐसे अमूल्य रिश्तों को ठुकरा कर कर हम अपनी खुशियों को तलाशने लगते हैं, और बाद में हर चीज गवा बैठते हैं। खुद के लिए खुशियाँ झूठी हो जाती है, इस लिए हो सके तो असली खुशियों को तलाशिये  अपनो में।
 मुश्किल कार्य नहीं है पर समय लेता है। 
कठिन है लेकिन ज़िंदगी आसान बना देता है ।
 हो सके तो मैं-तुम की दुनिया से एक नजर बाहर भी देख ली जाय । 

इस दो पंक्ति में ......

एक रोज सब गीत गाएँगे ,
फिर हो सके तो गुनगुना पाएंगे, 
उसके बाद गीत शायद उन्हें याद रहे, 
वरना इस मैं-तुम की दुनिया में सारे भूल जाएंगे,,,,,

ये ईश्वर, खुदा, मसीहा, 
सब बातों की फितरत में आते हैं। 
'मैं' आने पर ना जाने कहाँ चले जाते हैं। 
ना खुद पे यकीन आए तो ,
मौजूद रह कर भी खामोशी बयां कर जाते हैं। 
हर सवाल का जवाब हमेशा ही खोजा करते हैं। 

तभी सारे उलझन से परे , 
फिर एक गीत हम लिख जाते हैं। 
धुन अपने मे ही बनाकर ..... 
फिर हो सके तो गुनगुना पाएंगे
एक रोज सब गीत गाएँगे

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