वही सभी.है....शाम का......
कुछ नाम का....कुछ काम का ....
अलमस्त शहर उन यादों में ....
कुछ शरारत भरी बातों में ....
निज का झूठा वादा ही सही....
अपनेपन को दिलासा ही सही.....
दो वक़्त ...मजा है उस खयाल का....
कुछ नाम का....कुछ काम का ...
है कुछ और भी....
रुको, करो गौर भी.....
ये सारी पंक्ति पता नहीं कैसी है.... लेकिन जो भी है.... कुछ तेरी है कुछ मेरी है..... अनीष "स्वर"

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