रविवार, 14 अप्रैल 2013

ज़िंदगी के मकसद को ढूँढती ये बेफ़जुल पंक्ति .......


खुद से तो खुदा भी परेशान


 जरूरत न हो तो ....ज़िंदगी भी आसान ....



फर्क की वजह यू ही ढूंढते हैं.....




भ्रम में खुद को यू ही सोचते हैं....




है जज्बा तो इस रफ़्तार को पहचान ....



जरूरत न हो तो ....ज़िंदगी भी आसान ....


खुद से तो खुदा भी परेशान ..... 



वक़्त कि बेड़ियाँ किसे कब बांधती है   !

हो बुलंद आवाज तो खुदा भी मानती है...


न कर इस सच्चे दिल को बेईमान .....



जरूरत न हो तो ....ज़िंदगी भी आसान ....



खुद से तो खुदा भी परेशान ..... 


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