मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

वक़्त के साथ.....और वक़्त के लिए...... दोस्तों कुछ मेरी आपकी पंक्ति.....


अब ज़िंदगी का बौराना ....  मजे में खुद को लुटाना .....

एक पल के डगर पे..... घंटो वक़्त बिताना .......

अच्छा नहीं लगता.... सच्चा नहीं जँचता ........


अब झूठे वादे के साये मे ...
सपनों के दुनिया में .....
हँसते हुए चेहरे का....
मित्रों के ठहाकों का....


इस लम्हों का नजराना ..... खुद मंजिल से फिसल जाना.....
एक पल के डगर पे..... घंटो वक़्त बिताना .......
अच्छा नहीं लगता.... सच्चा नहीं जँचता ........


क्यों खुद को तोड़ने में .....
मुश्किलों को मरोड़ ने में ......
अपने बाजू के ताकत का...
बढ़ते हुए आत्मविश्वास का ....


समय का साथ दे जाना .... फिर रास्तों का मिल जाना ...
एक पल के डगर पे..... घंटो वक़्त बिताना .......
अच्छा वही लगता..... सच्चा वही जँचता.......

अनीष 'स्वर'


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