सोमवार, 12 अगस्त 2013

सोया क्यों नहीं अब तक ......



एक दिन बाजार गया.......

थका आया ....... नींद लगी ........
आंखे मंद हुई............
सोया नहीं!
दीवारों से चीख निकली.......
सन्नाटों की आवाज आई......
झूठे बर्तनों.... पे नरम मासूम हाथों की रगड़ ,
आँखों मे झलकती बचपन बेअसर........
जूते चमकाते हाथ थकते नहीं......
दारू की भट्टी पे चेहरे झुलसते नहीं.......
कोमल कंधे अब हर बोझ सह लेते हैं.....

. क्योंकि 

भूखे पेट उम्मीद नहीं सह सकते हैं.........
इस समाज के जन्मे हम........
सिर्फ चार शब्दों मे .... कर्तव्य ढूंढ लेते हैं॥
हर कविता पढ़-लिख कर ,
समाज बदलना चाहते हैं...
क्यों आ जाती है नींद,
मानव बन कर ॥
फिर भी 
सोया नहीं अब तक ........